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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
अथ वाप्यनय़ा गुर्व्या हेमविग्रहय़ा रणे |  ४६   क
कालवद्विचरिष्यामि द्रौणेरस्त्रं विशातय़न् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति