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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
उपन्यस्य महातेजा विप्रेभ्यः पाण्डवांस्तदा |  २५   क
अनुसंसाध्य कौन्तेय़ानाशीर्भिरभिनन्द्य च |  २५   ख
वृषपर्वा निववृते पन्थानमुपदिश्य च ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति