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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रौणिः प्रहस्यैनमुदासमभिभाष्य च |  ५४   क
अवाकिरत्प्रदीप्ताग्रैः शरैस्तैरभिमन्त्रितैः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति