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आदि पर्व
अध्याय १७१
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वसिष्ठ उवाच
ततस्तं क्रोधजं तात और्वोऽग्निं वरुणालय़े |  २१   क
उत्ससर्ज स चैवाप उपय़ुङ्क्ते महोदधौ ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति