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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
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युधिष्ठिर उवाच
ईहमानः समारम्भान्यदि नासादय़ेद्धनम् |  १   क
धनतृष्णाभिभूतश्च किं कुर्वन्सुखमाप्नुय़ात् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति