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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
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भीष्म उवाच
नान्तं सर्वविवित्सानां गतपूर्वोऽस्ति कश्चन |  १७   क
शरीरे जीविते चैव तृष्णा मन्दस्य वर्धते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति