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अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
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भीष्म उवाच
न नग्नामीक्षते नारीं न विद्वान्पुरुषानपि |  २१   क
मैथुनं सततं गुप्तमाहारं च समाचरेत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति