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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
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भीष्म उवाच
तृप्तः स्वस्थेन्द्रिय़ो नित्यं यथालव्धेन वर्तय़न् |  ४४   क
न सकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति