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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
यथात्मनोऽङ्गं पतितं पृथिव्यां; स्वप्नान्तरे पश्यति चात्मनोऽन्यत् |  १४   क
श्रोत्रादिय़ुक्तः सुमनाः सुवुद्धि; र्लिङ्गात्तथा गच्छति लिङ्गमन्यत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति