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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
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भीष्म उवाच
कामान्व्युदस्य धुनुते यत्किञ्चित्पुरुषो रजः |  ४९   क
कामक्रोधोद्भवं दुःखमह्रीररतिरेव च ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति