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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
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भीष्म उवाच
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् |  ५१   क
तृष्णाक्षय़सुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति