वन पर्व  अध्याय १७१

अर्जुन उवाच

श्वः प्रभाते भवान्द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः |  १६   क
निवातकवचा घोरा यैर्मय़ा विनिपातिताः ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति