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वन पर्व
अध्याय १७१
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अर्जुन उवाच
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वय़ि तिष्ठन्ति भारत |  २   क
न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति