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वन पर्व
अध्याय १७१
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अर्जुन उवाच
देवदत्तं च मे शङ्खं देवः प्रादान्महारवम् |  ५   क
दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वय़मिन्द्रो युय़ोज ह ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति