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वन पर्व
अध्याय १७१
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अर्जुन उवाच
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च |  ६   क
प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि वृहन्ति च ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति