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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
अपकृष्यमाणः कौन्तेय़ो नदत्येव महारथः |  १४   क
वर्धते चैव तद्घोरं द्रौणेरस्त्रं सुदुर्जय़म् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति