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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
वनं प्रव्राजिताश्चास्म वल्कलाजिनवाससः |  १०   क
अनर्हमाणास्तं भावं त्रय़ोदश समाः परैः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति