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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
व्यपोढे च ततो घोरे तस्मिंस्तेजसि भारत |  २२   क
वभौ भीमो निशापाय़े धीमान्सूर्य इवोदितः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति