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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामन्पुनः शीघ्रमस्त्रमेतत्प्रय़ोजय़ |  २५   क
व्यवस्थिता हि पाञ्चालाः पुनरेव जय़ैषिणः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति