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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
जानन्पितुः स निधनं सिंहलाङ्गूलकेतनः |  ३४   क
सक्रोधो भय़मुत्सृज्य अभिदुद्राव पार्षतम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति