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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
सारथिं चास्य विंशत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः |  ३७   क
हय़ांश्च चतुरोऽविध्यच्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति