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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
पार्षतस्तु वली राजन्कृतास्त्रः कृतनिश्रमः |  ३९   क
द्रौणिमेवाभिदुद्राव कृत्वा मृत्युं निवर्तनम् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति