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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
यथा रात्रिक्षय़े राजञ्ज्योतींष्यस्तगिरिं प्रति |  ४   क
समापेतुस्तथा वाणा भीमसेनरथं प्रति ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति