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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
सोऽतिविद्धो महेष्वासो नानालिङ्गैरमर्षणः |  ४७   क
युय़ुधानेन वै द्रौणिः प्रहसन्वाक्यमव्रवीत् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति