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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
अथान्येन सुपुङ्खेन शरेण नतपर्वणा |  ५३   क
आजघान भ्रुवोर्मध्ये धृष्टद्युम्नं परन्तपः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति