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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
आशीविषाभैर्विंशद्भिः पञ्चभिश्चापि ताञ्शरैः |  ५७   क
चिच्छेद युगपद्द्रौणिः पञ्चविंशतिसाय़कान् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति