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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
ततस्ते विव्यधुः सर्वे द्रौणिं राजन्महारथाः |  ५९   क
युगपच्च पृथक्चैव रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति