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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
यथा दग्ध्वा जगत्कृत्स्नं समय़े सचराचरम् |  ६   क
गच्छेदग्निर्विभोरास्यं तथास्त्रं भीममावृणोत् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति