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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
युवराजस्तु विंशत्या द्रौणिं विव्याध पत्रिणाम् |  ६०   क
पार्थश्च पुनरष्टाभिस्तथा सर्वे त्रिभिस्त्रिभिः ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति