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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
आसीनस्य स्वरथं तूग्रतेजाः; सुदर्शनस्येन्द्रकेतुप्रकाशौ |  ६३   क
भुजौ शिरश्चेन्द्रसमानवीर्य; स्त्रिभिः शरैर्युगपत्सञ्चकर्त ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति