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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
युवानमिन्दीवरदामवर्णं; चेदिप्रिय़ं युवराजं प्रहस्य |  ६५   क
वाणैस्त्वरावाञ्ज्वलिताग्निकल्पै; र्विद्ध्वा प्रादान्मृत्यवे साश्वसूतम् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति