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आदि पर्व
अध्याय १७२
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गन्धर्व उवाच
स तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मान एव च |  १७   क
भक्षय़न्दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति