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शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
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नारद उवाच
यदा सर्वं परित्यज्य गन्तव्यमवशेन ते |  ३३   क
अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं स्वमर्थं नानुतिष्ठसि ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति