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शान्ति पर्व
अध्याय १७२
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भीष्म उवाच
सुमहान्तमपि ग्रासं ग्रसे लव्धं यदृच्छय़ा |  १९   क
शय़े पुनरभुञ्जानो दिवसानि वहून्यपि ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति