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वन पर्व
अध्याय १८४
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सरस्वत्यु उवाच
कृशानुं ये जुह्वति श्रद्दधानाः; सत्यव्रता हुतशिष्टाशिनश्च |  १५   क
गवां लोकं प्राप्य ते पुण्यगन्धं; पश्यन्ति देवं परमं चापि सत्यम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति