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शान्ति पर्व
अध्याय १७२
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भीष्म उवाच
न हृदय़मनुरुध्यते मनो वा; प्रिय़सुखदुर्लभतामनित्यतां च |  ३४   क
तदुभय़मुपलक्षय़न्निवाहं; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति