शान्ति पर्व  अध्याय १७२

भीष्म उवाच

नानुतिष्ठसि धर्मार्थौ न कामे चापि वर्तसे |  ७   क
इन्द्रिय़ार्थाननादृत्य मुक्तश्चरसि साक्षिवत् ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति