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वन पर्व
अध्याय १७२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्रह्मर्षय़श्चैव सिद्धाश्चैव सुरर्षय़ः |  १२   क
जङ्गमानि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति