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वन पर्व
अध्याय १७२
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वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षय़श्च प्रवरास्तथैव च दिवौकसः |  १३   क
यक्षराक्षसगन्धर्वास्तथैव च पतत्रिणः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति