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वन पर्व
अध्याय १७२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाय़ुर्महाराज दिव्यैर्माल्यैः सुगन्धिभिः |  १५   क
अभितः पाण्डवांश्चित्रैरवचक्रे समन्ततः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति