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वन पर्व
अध्याय १७२
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वैशम्पाय़न उवाच
जगुश्च गाथा विविधा गन्धर्वाः सुरचोदिताः |  १६   क
ननृतुः सङ्घशश्चैव राजन्नप्सरसां गणाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति