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वन पर्व
अध्याय १७२
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत |  १८   क
नैतानि निरधिष्ठाने प्रय़ुज्यन्ते कदाचन ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति