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वन पर्व
अध्याय १७२
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वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संय़ुगे |  २२   क
योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति