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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
तत्प्रभग्नं वलं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |  १   क
न्यवारय़दमेय़ात्मा द्रोणपुत्रवधेप्सय़ा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति