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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
स तु यत्तो रथे स्थित्वा वार्युपस्पृश्य वीर्यवान् |  १४   क
देवैरपि सुदुर्धर्षमस्त्रमाग्नेय़माददे ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति