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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
आपतत्सु च वेगेन वध्यमाने वलेऽपि च |  २०   क
विगाढाय़ां रजन्यां च राजा दैन्यं परं गतः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति