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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रं सत्कर्मभिर्मर्त्याः पूजय़न्तीह दैवतम् |  २४   क
शिवमित्येव यं प्राहुरीशं रुद्रं पिनाकिनम् |  २४   ख
भावैस्तु विविधाकारैः पूजय़न्ति महेश्वरम् ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति