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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
शरतेजोऽभिसन्तप्ता नागा भूमिशय़ास्तथा |  २०   क
निःश्वसन्तः समुत्पेतुस्तेजो घोरं मुमुक्षवः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति