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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
जलजानि च सत्त्वानि दह्यमानानि भारत |  २१   क
न शान्तिमुपजग्मुर्हि तप्यमानैर्जलाशय़ैः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति