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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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उत्तङ्क उवाच
यदि त्वनुग्रहं कञ्चित्त्वत्तोऽर्होऽहं जनार्दन |  ३   क
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं तन्निदर्शय़ ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति