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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
नैव नस्तादृशं राजन्दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् |  ३१   क
यादृशं द्रोणपुत्रेण सृष्टमस्त्रममर्षिणा ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति